Debt Mutual Funds vs Fixed Deposits in Hindi/Debt funds vs fd/fd vs debt funds - Money Sanchay

Debt Mutual Funds vs Fixed Deposits in Hindi/Debt funds vs fd/fd vs debt funds

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अक्सर निवेशक जब निश्चित Return के बारे में सोचता है तो उसे Bank Fd और Debt Fund के बारे में ध्यान आता है, अब समस्या ये आती है कि इनमे से कौन सा बेहतर है | आज के इस लेख में हम Debt Mutual Funds vs Fixed Deposits in Hindi के विषय में चर्चा करके आप को दोनों निवेश माध्यमो के बारे में बताएँगे |

  

Why Debt Mutual Funds are Better than Bank FD

Debt Mutual Funds vs Fixed Deposits in Hindi

डेट म्युचुअल फंडों में लोग इसलिए पैसा लगाते हैं क्योंकि उन्हें बढ़िया मुनाफा मिलता है और जरूरत पड़ने पर फौरन नकदी की व्यवस्था भी हो जाती है। यहां डेट का मतलब बॉण्ड जैसे निवेश के साधन हैं।

हालिया आम बजट के कुछ प्रावधानों पर गौर करने से लगता है कि वित्त मंत्रालय निवेशकों का रुख डेट म्युचुअल फंडों से मोड़कर सरकारी बैंकों के डिपॉजिट की तरफ मोड़ने की मंशा रखता है। इसके लिए बजट में डेट म्युचुअल फंडों और बैंक की सावधि जमाओं (एफडी) के बीच टैक्स में तथाकथित अंतर खत्म करने की कोशिश की गई है। बावजूद इसके यह राह आसान नजर नहीं आ रही।

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वित्त मंत्रलाय ने कम-से-कम टैक्स के मामले में डेट म्युचुअल फंडों को निवेश के प्रतिस्पर्धी साधन बैंक डिपॉजिट के समान बनाने की भरसक कोशिश की है। मसलन, तीन साल से कम के सभी गैर-इक्विटी म्युचुअल फंडों से होने वाले पूंजीगत लाभ पर 10-30 प्रतिशत तक इनकम टैक्स लगेगा। इसके अलावा लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ पर टैक्स की दर बढ़ाकर 20 प्रतिशत (इंडेक्सेशन के साथ) कर दी गई है।

लेकिन, यदि सरकार यह सब करके उम्मीद कर रही है कि भारी तादाद में निवेशक डेट म्युचुअल फंडों को छोड़कर बैंक एफडी (फिक्स्ड डिपॉजिट) का रुख करेंगे, तो वास्तव में ऐसा नहीं भी हो सकता है। कुल मिलाकर जब कभी कोई निवेशक कहीं पैसा लगाने का फैसला करता है, तो इसका आधार केवल टैक्स नहीं होता। जाहिर है, केवल टैक्स में अंतर की वजह से निवेशकों के निर्णय प्रभावित नहीं होते।

टैक्स के अलावा दूसरे पहलू भी

यदि सरकार वाकई डेट म्युचुअल फंडों में पैसा लगाने वाले लोगों का रुख बैंक एफडी की तरफ मोड़ना चाहती है, तो इसके लिए कई दूसरे उपाय भी करने होंगे। उदाहरण के लिए संभावित रिटर्न, लिक्विडिटी (नकदी में तब्दील करने में सहूलियत) और निवेश की सुरक्षा जैसे पहलूओं पर भी गंभीरता से गौर करना होगा। इन तीन में से दो चीजों के मामले में डेट म्युचुअल फंड, खास तौर पर ओपन एंडेड वेराइटी वाले फंड अब बैंक एफडी के मुकाबले बेहतर हैं। लेकिन, यह भी सच है कि निवेशक अलग-अलग तरह के होते हैं और तयशुदा आय के मामले में उनकी जरूरतें भी अलग-अलग होती हैं।

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Liquidity  चाहने वाले निवेशक
डेट फंडों में पैसा लगाने वाले ज्यादातर निवेशक ऐसे होते हैं जो जरूरत पड़ने पर कभी भी फौरन नकदी का इंतजाम चाहते हैं। इस मामले में निवेश भुनाने की अवधि महज कुछ दिनों से लेकर एक साल तक हो सकती है। डेट म्युचुअल फंडों की मुकम्मल संपत्ति के दो-तिहाई हिस्से से ज्यादा, यानी दो लाख करोड़ रुपए से अधिक ऐसे ही फंडों में हैं। इस बाजार में निवेशकों की दूसरी ेणी कॉर्पोरेट ट्रेजरी या संस्था हैं, जो लिक्विड या अल्ट्रा-शॉर्ट टर्म डेट फंडों का इस्तेमाल बैंक खातों के विकल्प के तौर पर करते हैं।
अब यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि ऐसे निवेशकों के लिए लिक्विड और अल्ट्रा-शॉर्ट टर्म फंड्स निश्चित तौर पर बैंक डिपॉजिट से बेहतर हैं। ऐसे लोगों को नकदी संबंधी तमाम सुविधाओं के बावजूद शॉर्ट-टर्म मार्केट रेट्स के आधार पर सालाना 6 से लेकर 8 प्रतिशत तक रिटर्न मिल जाता है। यह चालू खाता से लाख गुना बेहतर है, जिसमें रखी हुई रकम पर कोई ब्याज नहीं मिलता। डेट म्युचुअल फंडों में पैसा लगाने वाले ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें बैंकों में थोक जमा पर मिलने वाले ब्याज से कुछ कम आय होती है। लेकिन, उन्हें नकदी की शानदार सुविधा मिलती है। वे अपनी मर्जी से जब चाहें फंड से रकम निकाल सकते हैं और ऐसा करने पर रिटर्न के मामले में कोई नुकसान भी नहीं उठाना पड़ता।
इस बाजार के कुछ निवेशक ऐसे भी होते हैं जो आम तौर पर खुदरा निवेश पसंद करते हैं। कई अमीर लोग नकद रकम और मनी मार्केट फंडों का इस्तेमाल बचत बैंक खातों के विकल्प के तौर पर करते हैं। ऐसे निवेशक अक्सर लिक्विड या अल्ट्रा-शॉर्ट टर्म फंडों में पैसा लगाना पसंद करते हैं क्योंकि ऐसा करने से उन्हें बैंकों के सेविंग अकाउंट के मुकाबले बेहतर रिटर्न मिलता है। जहां ज्यादातर घरेलू बैंक बचत खाते पर 4 प्रतिशत (कुछ बैंक 6 फीसद) ब्याज दर की पेशकश करते हैं वहीं पिछले पांच साल के दौरान लिक्विड और अल्ट्रा-शॉर्ट टर्म बॉण्ड फंडों ने औसतन 7.7-7.8 प्रतिशत सालाना रिटर्न दिए हैं।

इसके अलावा बजट के तहत टैक्स के मामले में जो बदलाव किए हैं, उनकी वजह से ऐसे निवेशकों को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके पूंजीगत लाभ एक साल से कम समय के होते हैं, जहां उनकी मार्जिनल इनकम टैक्स रेट्स के हिसाब से टैक्स लगता है। इससे पता चलता है कि ऐसे निवेशक केवल लिक्विडिटी और रिटर्न के लिए डेट फंडों में निवेशक करते हैं, टैक्स संबंधी मामलों में सहूलियत के लिए नहीं।

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Return को तरजीह देने वाले निवेशक
डेट म्युचुअल फंडों में दांव लगाने वाले दूसरी ेणी के निवेशक 1-3 साल के लिए निवेश करते हैं और शानदार रिटर्न चाहते हैं। ऐसे निवेशक शॉर्ट टर्म बॉण्ड फंड्स, इनकम फंड्स, इाइनैमिक बॉण्ड फंड्स और कॉर्पोरेट बॉण्ड फंडों में से किसी एक का चयन कर सकते हैं या फिर फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लांस पर गौर कर सकते हैं।
जो निवेशक ज्यादा रिटर्न के लिए बाजार से जुड़े जोखिम की परवाह नहीं करते और कभी भी नकदी की सहूलियत चाहते हैं, उन्हें ओपन-एंड बॉण्ड फंडों में पैसा लगाना चाहिए। लेकिन, बैंक डिपॉजिट पर भरोसा करने वाले पारंपरिक निवेशक, जो बचत की रकम को कुछ समय के लिए भूल जाने की क्षमता रखते हैं और सबसे ज्यादा रिटर्न चाहते हैं, उन्हें फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लांस (एफएमपी) पर गौर करना चाहिए। दूसरे तरह के निवेशकों के लिए 370 दिन वाले एफएमपी अब तक शानदार साबित हुए हैं। यह सही है कि ऐसे निवेशकों के पोर्टफोलियो रिटर्न 1-3 साल वाले बैंक एफडी से मिलने वाले रिटर्न के बराबर ठहर सकते हैं, लेकिन उन्हें बेहतर कर-बाद रिटर्न हाथ लग सकता है क्योंकि ऐसे में वे दोहरे कराधान जैसी सुविधाओं का फायदा उठा सकते हैं।

टैक्स के आधार पर इस बात संभावना बनती है कि ऐसे निवेशकों को बैंक एफडी पसंद आ सकते हैं, जो पहले से तय रिटर्न की पेशकश करते हैं। इस मामले में पेंच यह है कि ज्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि ब्याज दरें फिलहाल सबसे ऊंचे स्तर पर हैं और अगले एक से दो साल के दौरान इसमें गिरावट आना लगभग तय है। इस लिहाज से अगले 2-3 साल के दौरान शानदार तरीके से मैनेज्ड फंडों का रिटर्न बैंक एफडी के मुकाबले ज्यादा ठहरने की तगड़ी गुंजाइश बनती है। ऐसे में, जो निवेशक बाजार से जुड़े जोखिम बर्दाश्त करने के लिए तैयार हैं और जिन्हें कभी भी मोटी नकद रकम की जरूरत पड़ सकती हो, उनके लिए शॉर्ट टर्म डेट फंड्स, इनकम फंड्स और डाइनैमिक फंड्स अब भी फायदेमंद साबित हो सकते हैं।

Roll Over
कुछ म्युचुअल फंड हाउसेज अब एफएमपी निवेशकों को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए उनकी एक साल की ईएमपी पर एक्सटेंशन और रॉलओवर विकल्पों की पेशकश की जा रही है, ताकि ऐसे निवेशक लांग-टर्म कैपिटल गेन (लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ) का फायदा उठा सकें।
लेकिन ऐसे निवेशकों को फैसला करने से पहले दो चीजों पर गौर करना चाहिए। जरूरी नहीं है कि फिलहाल जो ब्याज दरें हैं, वे एक साल पहले की प्रचलित दरों के बराबर हों। इसलिए, यह देखते हुए कि एफएमपी शुरुआती तौर पर केवल एक साल के लिए थे, उन्हें अब पुराने बॉण्ड भुनाने होंगे और फंड रॉलओवर करने के लिए नए इंस्ट्रूमेंट खरीदने होंगे। इस वजह से ऐसे फंडों के अनुमानित रिटर्न घट-बढ़ सकते हैं।
गौर करने लायक दूसरा पहलू यह है कि फिक्स्ड रेट वाले फंडों में पैसा लगाकर कुछ समय के लिए लॉक करने वाले निवेशक ब्याज दरों में गिरावट के दौर में ट्रेडिंग करके अतिरिक्त लाभ कमाने से वंचित रह सकते हैं। यदि अगले दो वर्षों के दौरान ब्याज दरों में गिरावट की गुंजाइश बनती हो, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि बढ़िया तरीके से मैनेज्ड डेट फंडों का रिटर्न एफएमपी के मुकाबले ज्यादा होगा।
कुल मिलाकर यह बात सही जान पड़ती है कि टैक्स संबंधी नए प्रावधानों की वजह से डेट म्युचुअल फंड इंडस्ट्री के 1-3 साल वाले एफएमपी जैसे प्रोडक्ट के प्रति कुछ आकर्षण कम होगा, लेकिन समझदार निवेशकों को अब भी एक्टिवली मैनेज्ड ओपन एंड डेट फंडों के साथ बने रहने के ढेरों कारण मिल सकते हैं।
आशा है की आपको Debt Mutual Funds vs Fixed Deposits in Hindi के इस लेख से आपको कुछ विशेष जानकारियां मिली होंगीं | अगर आपके पास कुछ विशेष हो तो हमें जरुर बताएं |
“Debt Mutual Funds vs Fixed Deposits in Hindi”

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